Thursday, 10 May 2012

देश गुलाम क्यों बनता है ..

हमारे देश का भद्रलोक अंग्रेजों का उत्तराधिकारी क्यों बना हुआ है? यह बगुलाभगत अपने स्वार्थ की माला जपना कब बंद करेगा? दिमागी गुलामी और नकल से भारत का छुटकारा कब होगा? इसकी पहल जनता को ही करनी होगी। गुलामी के खंडहरों को ढहाने का अभियान यदि जनता स्वयं शुरू करे तो नेतागण अपने आप पीछे चले आएंगे।देश अभी रेंग रहा है। जिस दिन सचमुच गुलामी हटेगी, वह दौड़ेगा।


जो हाल संसद और अदालत का है, वही सरकार का भी है। किसी स्वतंत्र राष्ट्र में सरकार की हैसियत क्या होनी चाहिए? मालिक की या सेवक की? जैसे अंग्रेज शासन को अपने बाप की जागीर समझता था, वैसे ही हमारे नेता भी समझते हैं। उनकी अकड़, उनकी शान-शौकत, उनका भ्रष्टाचार देखने लायक होता है। वे अकेले दोषी नहीं हैं। इसके लिए वह जनता जिम्मेदार है, जो उन्हें बर्दाश्त करती है। वह अभी भी गुलामी में जी रही है।


भारत की शासन-व्यवस्था ही नहीं, समाज-व्यवस्था भी गुलामी से ग्रस्त है। दीक्षांत समारोह के अवसर पर चोगा और टोपा पहनकर हम ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज के स्नातकों की नकल करते हैं। बच्चों को स्कूल भेजते समय उनके गले में टाइयां लटका देते हैं। जन्मदिन मनाने के लिए केक काटते हैं। शादी के निमंत्रण-पत्र अंग्रेजी में भेजते हैं। दस्तखत अपनी भाषा में नहीं करते। अपनी मां को ‘मम्मी’ और पिता को ‘डैडी’ कहते हैं।


हम जितने मालदार और ताकतवर होते जा रहे हैं, उतने ही तगड़े नकलची भी बनते जा रहे हैं। हमने अंग्रेजों को भी मात कर दिया है। वे उपनिवेशों का खून चूसते थे। परायों को गुलाम बनाते थे। हम अपनों को ही अपना गुलाम बनाते हैं।